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Sunday, January 22, 2012

दुरुस्त हों व्यभिचार कानून के झोल

सीत मिश्रा
लेखक



दुरुस्त हों व्यभिचार कानून के झोल
दुरुस्त हों व्यभिचार कानून के झोल
अपने यहां व्यभिचार का कानून सिर्फ पुरुष को ही दोषी ठहराता है, विवाहित स्त्री के विरुद्ध किसी कार्रवाई की इजाजत नहीं देता.
अगर इस तरह के संबंध में स्त्री के पति की रजामंदी हो या मिलीभगत हो तो व्यभिचारी पुरुष के विरुद्ध भी केस नहीं बनेगा. साफ है, इस विचित्र कानून में स्त्री पुरुष की सम्पत्ति जैसी मान ली गई है. यानी पतिअनुमित दे तो पत्नी किसी अन्य के साथ समागम कर सकती है और यह कानून विरुद्ध नहीं होगा.
हाल में एक मुकदमे पर विचार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने पुरुष वर्चस्व का समर्थन करनेवाले इस कानून की सख्त आलोचना की है. दिलचस्प है कि पुरुष और स्त्री की हैसियत में फर्क करनेवाली यह व्यवस्था जिस भारतीय दंड संहिता में शामिल है, वह 6 अक्टूबर 1860 को यानी आज से डेढ़ सौ साल पहले पास हुई थी. तब से अब तक इसमें सैकड़ों संशोधन हो चुके हैं पर इसकी धारा 497 को नहीं बदला गया, जिसमें स्त्री की हैसियत दोयम दर्जे की है.
राष्ट्रीय महिला आयोग महिलाओं के मामलों से जुड़े अनेक कानूनों में संशोधन चाहता है पर भारतीय दंड संहिता की धारा 497 के बारे में उसकी भी राय यह कि इसमें ऐसा कोई संशोधन न किया जाए जिससे विवाहेतर संबंधों के मामले में महिला को दोषी मान उसके लिए सजा तय की जाए. आयोग के अनुसार, धारा 497 के पीछे विधि निर्माताओं के दिमाग में शायद यह विचार रहा होगा कि भारत में स्त्री की स्थिति अत्यंत दयनीय रही है और व्यभिचार के मामले में वह सिर्फ शिकार होती है, उसकी अपनी सहमति नहीं होती. कहने की जरूरत नहीं कि यह मान्यता विवाहित स्त्री को नाचीज मानती है और उसकी नैतिक देखभाल का जिम्मा पति को सौंप देती है.
अगर पत्नी का विवाहेतर संबंध है, तो कानून इस संबंध में शामिल पुरुष को तो सजा देगा, पर स्त्री को दंडित करने या न करने का काम उसके स्वामी का है. लगता है राष्ट्रीय महिला आयोग भी डेढ़ सौ साल पुरानी इस मान्यता के पक्ष में है और स्त्री को पुरुष के बराबर जिम्मेदार नहीं मानता. उसकी नजर में व्यभिचार में दोष पुरुष का है, न कि स्त्री का. आयोग का कहना है, स्त्री के मामले में इसे अपराध के बजाय विासघात माना जाना चाहिए, जबकि व्यभिचारी पुरुष की आपराधिक स्थिति कायम रहनी चाहिए.
स्पष्ट है कि स्त्री की अपनी सहमति का कोई मूल्य नहीं है. वह अपनी इच्छा से किसी अन्य पुरुष के साथ शारीरिक संबंध नहीं बना सकती. इसके लिए उसे पति की अनुमति चाहिए और पति चाहे तो स्त्री को उसकी दैहिक कैद से मुक्त कर सकता है. इस तरह किसी विवाहिता का मन भले अपना हो, पर शरीर अपना नहीं है. इसमें पुरुष का साझा है. साझा भी ऐसा कि सारे फैसले पुरुष ही करेगा. स्त्री को अनुगामी बनना होगा. लेकिन विवाहित पुरुष यदि वह किसी अन्य स्त्री से शारीरिक संबंध बनाना चाहता है, तो इसके लिए उसे पत्नी की सहिमत लेने की बाध्यता नहीं है. यहां हम फिर पाते हैं कि जो पुरुष विवाहेतर संबंध बनाए हैं, उसके शरीर में उसकी पत्नी की साझेदारी नहीं है.
साझेदारी है भी, तो निष्क्रिय है. यानी पत्नी के शरीर पर तो पति का अधिकार है, पर पति के शरीर पर पत्नी का कोई अधिकार नहीं. इसीलिए भारतीय दंड संहिता की धारा 497 में यह प्रावधान नहीं किया गया है कि यदि कोई पुरुष अपनी पत्नी की सहमति के बिना किसी अन्य स्त्री से समागम करता है, तो उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाएगी. यह शिकायत ले कर पीड़ित पत्नी भी अदालत नहीं जा सकती.
चाहे जिस कोण से देखिए, स्त्री पुरुष की संपत्ति है. जिस तरह किसी की सम्पत्ति बिना इजाजत इस्तेमाल करना गलत है और ऐसा करनेवाले के विरुद्ध कार्रवाई हो सकती है, उसी तरह पत्नी पति की संपत्ति है, जिसके साथ उसकी इजाजत के बिना या उसे राजी किए बिना शारीरिक संबंध नहीं बनाया जा सकता.
अगर कोई पति किसी भी कारण पत्नी को किसी अन्य पुरुष से यौन संबंध बनाने की छूट दे देता है तो वह अन्य पुरुष व्यभिचार का दोषी नहीं होगा. लेकिन पत्नी स्वेच्छा से किसी अन्य से संबंध बनाती है, तो वह पुरुष अपराधी करार दिया जाएगा. अत: पुरुषों का यह आरोप सारहीन नहीं कि यह कानून पुरुषों के प्रति पूर्वाग्रह से भरा है. इसलिए या तो इसे समाप्त होना चाहिए या स्त्री को भी दंडित करने का प्रावधान होना चाहिए. पति की अनुमित वाला हिस्सा तो खालिस औरत-विरोधी है. स्त्री अपने कृत्य के लिए स्वयं जिम्मेदार होगी, तभी उसका व्यक्त्वि भी बनेगा.
महिलाओं की स्वतंत्रता और उनके अधिकारों को लेकर यह विडंबना परंपराग्रस्त रूढ़िग्रस्त मानसिकता का नतीजा है. स्त्री को बराबरी का अधिकार देने की बात आज के प्रगतिशील परिवेश में भी शामिल नहीं हो पाई है. हम लाख आधुनिकता की बात कर लें परंतु पुरुष-प्रधान सामाजिक एवं प्रशासनिक व्यवस्था के चलते स्त्री पर पुरुष का वर्चस्व बरकरार है. इस मामले में संसार के तकरीबन सभी धर्मग्रन्थों में आश्चर्यजनक समानता है. यही भावना दुनिया के अनेक देशों की दंड संहिता में भी पाई जाती है. हैरत है कि फ्रांस में भी, जिसे यौन क्रांति का अलम्बरदार माना जाता है, ऐसा भेदभाव कायम है.

Wednesday, July 20, 2011

नन्ही सी जान



मेरी पैदाइश का किस्सा बड़ा अजीब है। जब मैं पैदा होने वाली थी तो नौ महीने मेरी माता जी को भी पता नहीं  था कि वे प्रेगनेन्ट है। वो तो अचानक माता जी के पेट में तेज दर्द हुआ इससे पहले की वो कुछ समझ पाती उन्हें जोर की छींक आयी और मैंने अपने निकलने का रास्ता ख़ुद ढ़ूंढ़ लिया। मैं उस छींक के सहारे उनके मुंखारविन्द से इस जमीन आ गयी। मेरे पैदा होने का कहीं कोई खुशी कहीं कोई जश्न नहीं हुआ पर हद तो तब हो गयी जब मेरी मां ने मेरे पैदा होने के बाद रोना शुरु किया। मैं नन्ही सी जान हैरान-परेशान हो गयी वो तो भला हो पिताजी का जिन्होंने मां के रोने का कारण पूछा तो मां ने रोते रोते बताया की मेरी बिटिया मुझे मिल नहीं रही है एक्चुली छींक इतनी ज़बरदस्त थी कि मैं दूर छिटक गयी जब पिताजी ने मुझे ढूंढ़ना शुरु किया तो उन्होंने पाया कि मैं चूहे के बिल के पास पड़ी, मेढ़क जैसी आंखें फ़ाड़े मां को ढूंढ़ रही थी उस समय मैं पिताजी के एक उंगली के बराबर थी उन्होंने मुझे हथेली में उठाया और मां को ले जाकर सौंप दिया। तभी से मेरी मां ने मुझे चूहिया बुलाना शुरु कर दिया।
इस नामकरण के बाद तो मेरी दुनिया ही बदल गयी मुझे याद है कि कई बार जब मालिश होने के बाद माता जी मुझे जम़ीन पर सुला देती थी तो चूहे घण्टों मेरे साथ ख़ेलते रहते, ख़ेलते क्या थे, मेरी पूंछ ढूंढ़ते थे। कुछ न मिलने पर मेरे बालों को ही कुतर ड़ालते थे  और शुक्र है, कि मुझे छोड़ देते थे। कई चूहों ने मुझे अपनी बहन ही समझा और बिल में चलने का आग्रह किया। मेरे न जाने पर वे मेरी गुस्ताखी पर बहुत नाराज हुए और मुझे घसीटकर अपने बिल तक ले भी गये पर हर बार उनके नेक इरादों पर मां पानी फेर देती यानि हर बार मां बीच-बचाव कर लेती थी।
एक दिन मैं बिस्तर पर पड़ी खेल रही थी और खेलते-खेलते मैं जमीन पर लुढ़क गयी। वैसे मैं अक्सर जमीन पर लुढ़क जाया करती थी जिसके कारण लोग मुझे जमीन से ज़ुड़े होने का गौरव प्रदान करते हैं। हां! तो मैं जमीन पर लुढ़क गयी और मेरी दाई झाड़ू लगाते हुए सारे कचरों के साथ मुझ अनमोल रत्न को भी झाड़कर ले गयी। मैं जी-जान छोड़कर चिल्ला रही थी पर मेरी मधुर वाणी उस दाई तक नहीं पहुंच पा रही थी। वो तो मां मुझे ढूंढ़ती हुई चली आयी और उनकी बदौलत मैं एक बोझ की तरह आज भी इस धरती पर शोभायमान हूं।
मां चाहती थी कि मैं भी  अपने अन्य भाई बहनों की तरह स्वस्थ हो जाऊं क्योंकि आए दिन लोग ठंड़ी हवा के लिए छत पर जाते सभी लोग हवा खाते और हवाए मुझे खाने की कोशिश में लग जाती थी अगर बारिश भी साथ में होने लगे तो मैं उस पहाड़ रुपी बुंदों के नीचे दबती जाती थी और अगर बारिश जरा तेज होने लगे तो मेरे लिए तो बाढ़ आ जाती थी मेरी वजह से सबको अपना मन मसोसना पड़ता था इसके लिए उन्होंने कई कोशिशो की कि मैं भी स्वस्थ रहुं मां मेरे लिए बाबा जामदेव की एक दवा लौह बज्रासन ले आयी जिसका स्लोगन था एक चम्मच खाओं हाथी हो जाओ चूंकि हमारी मां बहुत सीधी-सादी है इसलिए हर बात पर आसानी से यकीन कर लेती थी यही कारण था कि वे लौहबज्रासन ले आयी। सर्वप्रथम एक चम्मच पिलाया आधे घण्टे बाद देखा कोई फर्क नहीं आया तो फिर एक चम्मच पिलाया पुनः कोई फर्क न पड़ता देखकर उन्होंने पूरी की पूरी बाटल मेरे मुंह में उड़ेल दी फिर तो जो उल्टियां शुरु हो गयी कि मैं और आधी हो गयी। सारे प्रयत्न हमेशा की तरह विफल रहे इस कारण मेरी सहेलियों ने मुझे सूखी हड्डी, माचिस की तीली, सुखण्डी पहलवान और नन्ही सी जान आदि विभिन्न नामों से पुकारना शुरू कर दिया। चाहे जो भी हो मेरे हौसले हमेशा से बुलन्द रहे है मैंने कभी भी अपने आपको कमजोर या पतला नहीं माना पर मेरे अकेले के मानने से क्या होता है लोग माने फिर तो कोई बात बने। खैर, मेरा मानना था कि -
मंजिले उन्हीं को मिलती है, जिनके सपनों में जान होती है।
सिर्फ पंख फड़फडाने से कुछ नहीं होता, हौसलो से उडान होती है।
 इस कारण जरा भी कही दंगे फसाद होते थे मैं पहले कूद जाया करती थी पर कोई फायदा न होता लोग मुझसे डरते ही न थे क्योंकि मैं किसी को दिखाई ही न पडती थी और अगर कभी दिख भी जाती तो मेरी कद्र कोई न करता था    
तमाम कोशिशों के बावजूद मुझमें कोई ख़ास फ़र्क नहीं आया है और मैं जस की तस बनी हुई हूं। इसी कारण जब कोई मुझसे मेरा जन्म दिन पूछता है तो मैं बता नहीं पाती क्योंकि मैं तो पैदा ही नहीं हुई हूं मैं तो डायरेक्ट टपकी हूं। मैंने तो अवतार लिया है।

Friday, May 6, 2011

“कहने को जश्न-ए-बहारा है”

कहने के लिए भारत 21वीं सदी के विश्व की उभरती हुई वैश्विक महाशक्ति की संज्ञा दी गयी है। तकनीकी क्षेत्र में भी इसका कोई सानी नहीं है। इसके साथ ही दूसरे देश स्वयं को भारत से जोड़ने में अपना हित समझते हैं। दूसरे देशों की तरह भारत भी विकासशील से विकसित राष्ट्र में तब्दील होने की जुगत भिड़ा रहा है। हमारा भारत जो कभी जगत गुरु हुआ करता था अपने मूल्यों संस्कारों और संस्कृति के लिए जाना जाता था। जहां लोग संस्कृति और संस्कार को भारत की आत्मा कहते थे और उसी के दर्शन के लिए यहां आते थे।

अब वे मूल्य संस्कार कहीं नजर नहीं आते। शायद गाहे बगाहे उनका जिक्र किया जाता है। चन्द सालों पहले भारतीय समाज का मध्यम वर्गीय हिस्से के जुड़ने का माध्यम केवल आय नहीं था। सामान्य जन-जीवन में मूल्यों की अपनी मूल्य संहिता थी। भारतीय समाज का एक बड़ा तबका अपना सुख दुःख साझा करता था। सामाजिक रिश्तों में प्रगाढ़ता कुछ ऐसी थी कि लोग पड़ोस से चीनी-नमक तक मांग लाते थे और इसी आत्मीयता के चलते अवसर विशेष पर कुछ खास बनाकर एक दूसरे को भेट भी कर देते थे। हर वक्त एक दूसरे की मदद के लिए तत्पर रहते थे। उनके लिए रिश्ते बोझ नहीं बल्कि उनके जीवन जीने की यही शैली थी। उनका सामाजिक दायरा बहुत विस्तृत था। लेकिन बदलते समय की बदलती धारा के साथ अब भारत की वह छवि धुमिल होती जा रही है। परिस्थितियां ऐसी बदली की लगता है जैसे यह सब गुजरे जमाने की बातें हैं।

बीते 15 सालों में सामाजिक रिश्ते बहुत तेजी से परिवर्तित हुए हैं। रिश्तों को ताक पर रख दिया गया है। हम सामाजिक मूल्यों को खो रहे हैं। तकनीकि और उपभोक्तावादी होने को हम अपने विकास की कसौटी मान रहे हैं। मध्यम वर्ग को विस्थापित कर उपभोक्ता वर्ग ने उनका स्थान ले लिया है जहां लोगों को देश समाज और राजनीति से सरोकार नहीं है। उन्होंने अपने जीवन में भौतिकता को इतनी तरजीह दी है कि बाकी सारी बातें बेमानी हो गयी हैं। लोग भौतिकता और आडम्बर को अपनी उन्नति का पैमाना समझने लगे हैं। समाज भी इन्हीं कारणों से उन्हें सम्मानित नजरों से देखता है। अपनी अतृप्त लालसाओं की पूर्ति के लिए वे अधिकाधिक धनोपार्जन की कोशिश में दिन-रात लगे रहते हैं और इस नौकरी के अपने तनाव हैं, अपनी मजबूरियां हैं। उनके आस-पास उपस्थिति परिस्थितियां लोगों को ऐसे मकड़जाल में फंसा लेती हैं। कि लोग न चाहते हुए भी सामाजिक रिश्ते-नातों से कटने लगते हैं।
वर्तमान समय में एकल परिवार भी बिखरने के कगार पर है। उनका स्थान धीरे-धीरे नाभकीय परिवार लेने लगा है। इस भागमभाग जिन्दगी में सबसे ज्यादा मात रिश्ते खा रहे हैं। इस नये दौर में रिश्ते बेहतर से बद्तर की दिशा में अग्रसर हैं। जहां निजता का सम्मान नहीं, बल्कि निजता में दखल की उत्कंठा है। आधुनिकता में भौतिकता का घोल इस कदर शामिल है कि आर्थिक स्थितियों से ही व्यक्ति के कामयाबी का मापदण्ड होता हैं।
आर्थिक परिवेश का यह दायरा नितान्त संकुचित है जिसमें सम्बन्धों की गरिमा मू्ल्य मायने नहीं रखते। आधुनिकता की इस आंधी के दरम्यान रिश्तों ने अपना वजूद खो दिया है। रिश्तों की अहमियत पहले जैसी नहीं रह गयी है। अब मानसिक दायरा इतना संकीर्ण है कि इसमें सम्बन्धों का कोई औचित्य नहीं रह गया है। समय के साथ रिश्तों में विकृति आ गयी है। लोग अपनी हर छोटी-बड़ी खुशी को आर्थिक प्रगति के पीछे नजर अंदाज कर रहे हैं। अंधानुकरण के इस दौर में रिश्तों की मूल्य संहिता की धज्जियां उड़ चुकी हैं। कहीं कोई बेटा बाप की जायदाद के लिए जान ले रहा है तो कहीं पति कुल बीमा राशि के लिए पत्नी का गला रेत रहा है। बदलते समाज के बदलती विचारधारा में पैसों से ही व्यक्ति का चरित्र आकलन हो रहा है। ऐसे में यह प्रश्न उठना लाजमी हो जाता है कि लम्बे अन्तराल के बाद जब इन दरकते रिश्तों पर सिलन चलायी जायेगी तो क्या रिश्ते अपनी पूर्णता को प्राप्त कर पायेंगे? क्या आने वाले समय में हम अपनी भावी पीढ़ी को कुछ दे पायेंगे? खोखला समाज देकर हम उन्नतशील भारत की चाह रखते हैं! हम जो बोयेंगे वही काटना भी पड़ेगा । सब कुछ बिखर जाये इससे पहले हमारा जागना जरुरी है। जरुरत है रिश्तो को सहेजने और सम्भालने की वरना वक्त हमें कभी न भरने वाला कुछ जख्म दे जायेगा।
माना कि वर्तमान समय में भारत प्रगति की दिशा में आगे बढ़ रहा है, तरक्की कर रहा है। लेकिन अब तक इसी भारत के गौरवमयी इतिहास ने जीवन की निरंतरता और संस्कारों की तारतम्यता को बनाये रखने में सार्थक भूमिका निभाई है।हमारा इतिहास केवल घटनाओं का हिसाब किताब ही नहीं रखता, अपितु वह वर्तमान को सुधारने और आने वाले समय को सशक्त बनाने का माध्यम भी है।
अतः इनका अनुकरण करके हम अपने उत्थान की ओर उन्मुख हो सकते हैं। अगर हम अपने रिश्तों के साथ न्याय न कर सके तो भारत के विकसित होने का अर्थ बेमानी होकर रह जायेगा और शायद तब भारत महज आर्थिक महाशक्ति के रुप में एक सतही अवधारणा मात्र बनकर रह जायेगा।

Friday, September 3, 2010

वर्ष 1994 की मिस अर्जेंटिना सोलांगे मैग्नैनो ने अपने शरीर को और खूबसूरत बनाने की चाह में अपनी जान गंवा दी। मैग्नैनो अपनी शरीर की खूबसूरती बरकरार रखने के लिए कसरत और खान-पान तक ही नहीं रुकीं और खूबसूरती का यही जनून उनकी मौत का कारण बना। मैग्नैनो अपनी सफल मॉडलिंग एजेन्सी चलाती थी। कई बार प्लास्टिक सर्जरी द्वारा अपनी खूबसूरती में इजाफा करने वाली मैग्नैनो को 38 साल की उम्र में यह एहसास होने लगा था कि उनकी सुन्दरता कुछ धूमिल सी पड़ गई है, इसलिए अपने कूल्हे के आकार को ठीक कराने के लिए उन्होंने कॉस्मेटिक सर्जरी कराई लेकिन बदकिस्मती से कुछ यूं हुआ कि इस सर्जरी ने उनकी जान ले ली। मैग्नैनो के बारे में उनके एक मित्र का कहना है, “कि वह एक ऐसी स्त्री थी जो कामयाब थी, खूबसूरत थी, जिसके पास दुनिया का हर सुख था लेकिन अत्यधिक खूबसूरती की दीवानगी ने मैग्नैनो की जीवन लीला समाप्त कर दी”। मैग्नैनो की मौत आज बहस का विषय बन चुका है। इस मुद्दे पर बहस इसलिए भी है क्योंकि मैग्नैनो की मौत ने प्लास्टिक सर्जरी के बडेी उद्योग पर सवालिया निशान लगा दिया है। इस उद्योग के विस्तार का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि केवल अर्जेंटिना में ही हर तीसवीं महिला ने शरीर के किसी न किसी हिस्से की कास्मेटिक सर्जरी जरूर कराई है। आने वाले कुछ समय में यदि यह संख्या दसवीं तक पहुंच जाए तो यह कोई ताज्जुब की बात नहीं होनी चाहिए। अर्जेंटिना में इस सर्जरी का खर्चा दूसरे देशों के अपेक्षा कम है। यह व्यवसाय यहां खूब फल-फूल भी रहा है और इस व्यवसाय के जरिए पैसा भी खूब आ रहा है। आकड़ों की माने तो 2010 तक यानि आने वाले साल में अर्जेंटिना में यह उद्योग 100 बिलियन डॉलर तक पहुंच जाएगा। भारत में भी खूबसूरती की ये चाहत दिनों-दिन बढ़ रही है, चाहे बात छोटे पर्दे की हो अथवा बड़े पर्दे की। पर्दे पर दिखने वाली अभिनेत्रियों की छवियां आम युवतियों के हृदय में सपने पैदा करती हैं। सूचना के इस युग में महिलाएं इस बात से भली-भांति वाकिफ हैं कि बॉलीवुडिया नायिकाओं की खूबसूरती दैविक नहीं होती, इन्हें कृत्रिम तरीके से हासिल किया गया है मगर फिर भी आधुनिक समाज में महिलाएं सुंदरता के लिए कुछ भी कर गुजरने से गुरेज नहीं करती। सुन्दरता के सपने बेचने वाले उद्योगों और कम्पनियों ने महंगे कॉस्मेटिक्स प्लास्टिक सर्जरी और ब्यूटी पार्लर के जरिए महानगरीय महिलाओ में खूबसूरत बनने की होड़ मचा रखी है। काले को गोरा और बूढ़े को जवान बनाने का दावा करने वाली तमाम क्रीम बाजार में उपलब्ध है। दुनिया भर में सौन्दर्य प्रसाधनों का बाजार 20 अरब डालर से ज्यादा है। ‘फलां क्रीम 15 दिन में गोरा न बनाये तो पैसे वापस’, जाहिर है, दावे बहुत ऊंचे हैं इसीलिए मीडिया के जरिए सुन्दरता के ऐसे मानक तैयार किए जाते हैं जो आम महिलाओं के लिए शायद सम्भव न हों। महिलाओं की सुन्दरता का एक अंतर्राष्ट्रीय मानक बार्बी डॉल को ही लीजिए बार्बी गुड़िया के ढांचे के लिए शोधकर्ताओं ने उसके शरीर के अनुपात में कम्प्यूटर से एक महिला का माडल तैयार किया और खूबसूरती के इस मापदंड में महिला की कमर को इतना कमजोर रखा गया कि वह अपने उपरी हिस्से का बोझ नहीं उठा सकेगी। फिर भी बार्बी डॉल की शारीरिक बनावट को मीडिया ने आदर्श का रूप दे डाला। बावजूद इसके महिलाएं सौन्दर्य की मृगतृष्णा के पीछे निरन्तर भागती आईं हैं। इनमें भारतीय महिलाएं भी शामिल हैं। एक शोध के अनुसार हर चार में से तीन महिलाएं स्वयं की खूबसूरती को लेकर चिंतित रहती हैं। महिलाएं अपनी शारीरिक बनावट और खूबसूरती की तुलना फिल्मी हीरोइनों से करती हैं और उनके बनिस्बत खुद को कम खूबसूरत मानती हैं, यही कारण है कि वे सौन्दर्य उद्योगों का सहारा लेने के लिए विवश हो जाती हैं। महिलाओं के इसी असुरक्षा के भाव के चलते सौन्दर्य उद्योगों अपनी साख बनाए रखने में कामयाब है। सौन्दर्य प्रसाधन बनाने वाले और कॉस्मेटिक उद्योग को मंदी का यह दौर छू तक नहीं पाया है। भारत में भी ये उद्योग पूरी तरह अपना पांव पसार चुका है। कुछ वर्षों से वजन कम करने का दावा करने वाली कम्पनियां जमकर मुनाफा कमा रही है महिलाएं अपने स्वास्थ्य और आत्मसम्मान के साथ समझौते के रूप में जमकर मुनाफा कमा रही है। महिलाओं अपने आत्मसम्मान के साथ समझौते के रुप में खूबसूरती की कीमत अदा करनी पड़ती हैं महिलाओं की चिंता का विषय उनका बढ़ता वजन भी है वे छरहरी काया के पीछे पूरी सिद्दत से हर सम्भव कोशिश करती हैं। मिस अर्जेंटिना सोलांगे मैग्नैनो की मौत ने सुन्दरता उद्योग का निर्मम और भयावह चेहरा फिर से उजागर किया है। यह उन सभी महिलाओ के लिए चेतावनी स्वरुप है जो खूबसूरती की चाह में सौन्दर्य और कास्मेटिक सर्जरी उद्योग को अपने शरीर के साथ खिलवाड़ करने की इजाजत दे रही हैं। यह सिलसिला यूं ही जारी रहा तो भविष्य में सौंदर्य उद्योग जगत का और भी वीभत्स रूप हमारे सामने होगा।

Saturday, February 27, 2010

अहो भाग्य!

अहो भाग्य!
आंखों में आंसुओं का सैलाब है
सीने में मौजूद हैं बेहिसाब दर्द
कैसे करूं मैं अपने गम को बयां
लोग रोने भी नहीं देते
कहते हैं तुम्हारा भाग्य अच्छा था
जब अंतिम सांस ली तुम्हारे पिता ने
तो तुम उनके साथ थी
तुम उनके बहुत पास थी
मगर मन में
कुछ न कर पाने की कसक लिए हुए
अपने पिता को तड़पते हुए देखना
क्या मेरा अहो भाग्य था!

मेरे पिता को समर्पितः-

कैसे बचायें हम खुद को बिखर जाने से।
अब तो डर सा लगता है अपने आशियाने से
छोड़ गये हैं वो उदास हर मौसम को।
हम तो हंस देते थे कल तक जिनके मुस्कराने से।
न जाने कब तक पास रहेंगी ये तन्हाइंयाएक
जिन्दगी का साथ छुट जाने स
शायद महफिल कभी रोशन न हो सके वो हाथ नहीं रहे जो बचाते थे आफताब को बुझ जाने से
बहुत दूर चले गये हैं वो मेरी छुअन से
कैसे मनाऊं अब उन्हें रूठ जाने से।
कैसे बचाये हम खुद को बिखर जाने
से अब तो डर सा लगता है अपने आशियाने से

Tuesday, December 22, 2009

अनजाने शहर में

नोटः यह आलेख हिंदी भाषा के सबसे प्रतिष्ठित समाचार पत्र 'जनसत्ता' के नियमित कॉलम 'दुनिया मेरे आगे' में दिनांक 19 दिसंबर 2009 को प्रकाशित हो चुका है।
कुछ पाने की उम्मीद लिए मैं भी शामिल हो गयी दिल्ली के बाजार में। यहां आप जोड़-तोड़ करके कुछ पहचान तो पा लेते हैं लेकिन इस अंधी दौड़ में शामिल होकर अपना वजूद खो देते हैं। परिवार, लोगों दोस्तों, और पड़ोसियों ने बहुत समझाया पर जिद्द थी कि बस.. मुझे जाना है। कई लोगों ने मुझे अपने अनुभव सुनाए, मुझे सतर्क किया लेकिन हमेशा लगता रहा कि उनके अनुभव में सच्चाई नहीं है। मैं हरदम मानती रही कि ‘अच्छे के साथ हमेशा अच्छा ही होता है’ और इसी सिद्धांत को लेकर मैं चल पड़ी अंजाने सफर पर, अंजाने लोगों के बीच में। दिल्ली हर कदम पर आजमा रही थी कहीं डराती तो कहीं उम्मीदें जगा रही थी। दिल्ली की दौड़-धूप ने मुझे इस बात का एहसास करा दिया कि यहां सम्भावनाएं बहुत हैं पर सुकुन नहीं। इसी तर्ज पर चलती है दिल्ली। मेरी नजर में यही दिल्ली की वास्तविक पहचान है। मुझे मेरा लक्ष्य पता था पर उसके अभी भी सही रास्ते की तलाश जारी थी। दिल्ली की दौड़ती-भागती जिन्दगी बड़ी अजीब लगती है।
नौकरी की तलाश में इधऱ-उधर भटक रही थी। अधिकतर लोगों का बस यही जबाव होता ‘अभी जगह नहीं है’ कुछ लोग टाल-मटोल करके जता देते थे कि ‘आप चले जाइये यहां से हमारा समय बर्बाद मत कीजिए’। संयोग से मुझे भी दिल्ली में एक गॉड फॉदर मिल गये उन्होंने बड़े गौर से मेरी समस्या सुनी और उसे सुलझाने के लिए अपने दोस्त के ऑफिस मुझे भेज दिया। ऑफिस जाकर मैंने तमाम औपचारिकताएं निभाई घंटे भर के लम्बे इन्तजार के बाद श्रीमान जी ने मुझे अन्दर बुलाया सामने बैठने का इशारा करके वे अपनी फाइलों में व्यस्त हो गये। मैंने उनपर एक भरपूर नजर डाली। उनकी उम्र शायद 50 साल से उपर थी। आज क्या होगा के उधेड़बुन में पड़ी मैंने उनके चेहरे का पूरा निरीक्षण कर लिया था। थोड़ी देर बाद उन्होंने अपने काम से ध्यान हटाकर मुझसे पूछा, “तो तुम काम करने के लिए तैयार हो” मैंने सिर हिलाकर सहमति जताई इतनी ठोकरें खाने के बाद मेरे अन्दर निराशा घर कर गयी थी मैं हर बात को नकारात्मक ढ़ग से लेने लगी थी। ऐसे में एक ठौर मिल रहा था मैं उसे ठुकराना नहीं चाहती थी। मैंने अपने लिखे हुए व्यंग्य ,कविताओं और कहानियों की कतरनें उनकी ओर बढ़ा दीं। उन्होंने कहा, “इसकी कोई आवश्यकता नहीं है” मैं थोड़ी चकित हुई मैंने विस्मय से पूछा, “क्यों सर? यह सब देखकर आप इस बात का अंदाजा लगा सकते है कि मैं कैसा लिखती हूं और मैं आपकी संस्था के लिए किस प्रकार काम कर सकती हूं”। मेरी बातों को अनसुना करते हुए उन्होंने कहा, “ठीक है ठीक है यह सब छोड़ों बस मुझे खुश रखो यह तुम्हारा काम है” अपनी हरकतों से उन्होंने यह जता दिया कि उनके इरादे नेक नहीं हैं। उनकी बातों पर मुझे गुस्सा आ गया और जो मन में आया मैंने उन्हें भला-बुरा कहा। मेरे हलक से शब्द नहीं फुट रहे थे मैं पसीने से नहा उठी। उस शख्स शायद को इन बातों की आदत हो चुकी थी। उसने बड़े ही इत्मीनान से मेरी बात सुनी और कहा, यदि तुम्हें अपनी शील, मान-मर्यादा की इतनी ही चिन्ता थी तो तुम्हें अपने घर से निकलना ही नहीं चाहिए था। जिन्दगी भर चूहे के उसी बिल में पड़ी रहती, तुम्हें बाहर आने की जरुरत ही नहीं थी या फिर.......तुम्हारे लिए दुसरा रास्ता खुला है।’ उन्होंने बाहें फैलाते हुए कहा “जो तुम चाहती हो वो सारी खुशी तुम्हें यहां मिलेगी पर थोड़ी खुशी पर हमारा हक भी तो बनता है” इसके बाद उनके चेहरे पर कुटिल मुस्कान छा गई। मैं अन्दर ही अन्दर टूट रही थी। खुद के बिखर जाने के डर से मैने झट से अपनी सारी चीजें समेटीं और बाहर की ओर निकल पड़ी। एक अजीब सी बदहवासी और छटपटाहट थी मेरे भीतर । अजीब सी बेचैनी जो मेरे पूरे अस्तित्व को झकझोर रही थी। समूचा अस्तित्व जैसे बूंद-बूंद पिघलने लगा। परिवार, दोस्त, रिश्तेदार फिर सामने आकर खड़े हो गए। सारी बातें स्मृति पटल पर फिर से आ गईं। ‘अच्छे के साथ हमेशा अच्छा ही होता है’ सिध्दान्त जैसे धराशायी हो गया था। खुद को बुध्दिजीवी वर्ग के कहलाने वालों ने इस सिध्दान्त की धज्जियां उड़ा दी हैं। एक बड़ी पराजय की पीड़ा, अन्दर तक झकझोर देने वाली तिलमिलाहट और बुध्दिजीवियों के लिए अब बस एक कड़वाहट मात्र रह गयी थी। भले ही बहुत कुछ बदल गया हो पर आज भी लड़कियों के प्रति पुरुष समाज का नजरिया नहीं बदला है। इस सच का सामना मुझे दिल्ली में आकर हुआ। गावों, कस्बों से कामयाबी के सपने लिए आने वाली न जाने कितनी लड़कियों इस सच का सामना किया होगा।