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Saturday, May 5, 2012

ेहमें भी है जीने का हक

कहते हैं बेटियां ठंडी छांव होती हैं और घर की रौनक भी. वे जननी हैं तो पालनहार भी.
लेकिन लगता है हमारे समाज में बहुतों को यह रौनक रास नहीं आ रही है, शायद यही वजह है कि बेटियों के प्रति हद दर्जे की कई झकझोर देने वाली खबरें सामने आ रही हैं. कहीं बच्चियों को लावारिस छोड़ा जा रहा है, तो कहीं इस दुनिया की आबोहवा से वाकिफ होने से पहले ही उनका गला घोंटा जा रहा है. 

दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि बेटी बचाओ अभियान चलाने वाला हमारा समाज यह सब देख-सुनकर आंखें बंद कर लेता है. समाज में अन्याय के प्रति आवाज उठाने के बजाय आंखें बंद कर लेना बेहतर समझा जाता है. यह हालात ऐसे समय है जब बेटियां लगातार आगे बढ़ रही हैं और अपने परिवार का नाम देश-दुनिया में रौशन कर रही हैं. वे सरहद पर न केवल मुल्क की निगहबानी कर रही हैं बल्कि अपने बुजुर्ग मां-पिता का बोझ उठाकर उनका सहारा बन रही हैं.

जनगणना-2011 के आंकड़ों में एक कड़वी हकीकत यह सामने आई कि 0-6 साल आयु वर्ग में बच्चियों की तादाद कम हुई है. 2001 में लिंगानुपात यानि 1000 लड़कों के मुकाबले लड़कियों की तादाद 926 थी जो 2011 में घटकर महज 914 रह गई. आजादी के बाद से यह अब तक का सबसे खराब स्तर है. जनगणना आयुक्त सी चंद्रमौलि ने भी इसे बेहद चिंताजनक स्थिति करार दिया है.

इसका कारण यह है कि हम मीडिया, सोशल नेटवर्किंग साइट्स में बेटियों को बचाने का डंका पीटते हैं, सेमिनारों का आयोजन करते हैं, महिलाओं के हित के लिए कानून बनाते हैं, पर अपनी सोच कभी नहीं बदलते. इसी के चलते सारी योजनाएं कागजी पैमाने पर तो खरी उतरती हैं पर उनका असलियत से कोई लेना-देना नहीं होता. मसलन, प्रसव से पहले भ्रूण के सेक्स की जांच पर रोक लगाने के लिए पीएनडीटी एक्ट है लेकिन इसे अब तक सख्ती से लागू नहीं किया गया है.

नेशनल कमिश्नर फॉर विमेन (एनसीडब्ल्यू) ने पिछले साल सरकार से पीएनडीटी एक्ट को और सख्त बनाने की मांग की थी लेकिन अब तक इस ओर कुछ नहीं किया गया है. वैसे तो हमारे आस-पास आए दिन बेटियों, महिलाओं के अपनों के ही हाथों मारे जाने की खबरें आती हैं. कभी इज्जत के नाम पर, कभी बेटों की चाह में तो कभी आर्थिक विपन्नता की आड़ में बेटियों का गला रेत दिया जाता है.

दूरदराज इलाकों में हुई ऐसी घटनाओं से लोग वाकिफ भी नहीं हो पाते लेकिन कुछ मामले ऐसे भी आए है जिनकी जानकारी से देश का कोई भी कोना अछूता नहीं रह गया है. पश्चिम बंगाल के बर्दवान में एक शख्स ने अपनी तीन बेटियों और गर्भवती पत्नी को मार डाला, सिर्फ इसलिए क्योंकि उस शख्स को डर था कि कहीं चौथी बेटी पैदा न हो जाए. वहीं दिल्ली स्थित एम्स में लावारिस फलक को जख्मी हालात में भर्ती कराया गया, जहां वह जिंदगी से हार गई.

बेंगलुरू में तीन महीने की आफरीन को कथित तौर पर उसके पिता ने सिगरेट से जलाकर बेरहमी से पीटा जिसके बाद उसने अस्पताल में दम तोड़ दिया. ग्वालियर में एक व्यक्ति ने पिछले साल अक्टूबर में अपनी नवजात बेटी को अस्पताल में तंबाकू खिलाकर मार डाला. सुल्तानपुर में एक शख्स ने अपनी पत्नी को बच्चियां पैदा करने के ‘जुर्म’ में जला दिया साथ ही अपनी तीन बेटियों को भी आग के हवाले कर दिया. यह वे घटनाएं हैं जो मीडिया की सक्रियता के चलते सामने आई हैं, अन्यथा कई बार ऐसा होता है कि बेटियों को जन्मते ही मार दिया जाता है और किसी को पता भी नहीं चलता. 

विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि रूढ़िवादी राज्यों में बच्चियों की संख्या लगातार कम होती जा रही है. दिल्ली और उसके आसपास की स्थिति सबसे ज्यादा चिंताजनक है. दिल्ली में यह आंकड़ा 1000 बच्चों पर 882, हरियाणा में 849, जम्मू-कश्मीर में 870, पंजाब में 836, राजस्थान में 875 और उत्तर प्रदेश में 874 है. लगता है इन इलाकों में लोग बेटी नहीं सिर्फ बहू चाहते हैं, भले ही उसे खरीद कर लाना पड़े.

महाराष्ट्र जैसे प्रदेश में यह संख्या 896 होना चिंता का कारण है, क्योंकि वहां रूढ़ियां इतनी अधिक नहीं हैं. यह आंकड़े सभ्य समाज को चिंता में डालने के लिए पर्याप्त हैं. हालांकि कई सामाजिक संगठनों ने इसके लिए काम शुरू किया है, धार्मिंक संगठनों ने विशेष अभियान चलाया है, लेकिन इसका असर तो फिलहाल नजर नहीं आ रहा है.

कहते हैं कि अगर किसी समाज के विषय में जानना हो कि वह अच्छा है या बुरा तो वहां पर महिलाओं की स्थिति का अध्ययन कर लीजिए. हाल ही में प्रकाशित संयुक्त राष्ट्र संघ के आर्थिक-सामाजिक मामलों के विभाग की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत लड़कियों के लिए दुनिया में सबसे असुरक्षित देश बन गया है. इस रिपोर्ट को 150 देशों के 40 साल के रिकॉर्ड को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है.

भारत में 1 से 5 साल तक की करीब 75 फीसद बच्चियों की मौत हो जाती है. यह विश्व के किसी भी देश में होने वाली शिशु मृत्यु दर में लैंगिक असमानता की सबसे बदतर स्थिति है. चीन में 76 लड़कों की तुलना में 100 और भारत में 56 लड़कों की तुलना में 100 लड़कियों की मौत होती है. अन्य विकासशील देशों में यह आंकड़ा 122 लड़कों की तुलना में 100 लड़कियों का है. यहां तक कि पाकिस्तान, श्रीलंका, मिस्र और इराक में भी लड़कियों की स्थिति में सुधार देखा गया है.

भारत में बच्चियों की स्थिति का यह आंकड़ा वाकई भयावह है. विरासत और संस्कृति का दंभ भरने वाले शहरों में सड़कों पर लावारिस हालात में मिल रहीं बच्चियां सभ्य होने का दावा कर रहे समाज को उसका असली चेहरा दिखा रही हैं. तमाम भारतीय परिवारों में घर के भीतर नवजात बच्चियों पर अमानवीय अत्याचार किए जाते हैं, इतना करने के बाद भी अगर उस बच्ची की सांसे नहीं टूटतीं तो उसे जला दिया जाता है, नाले में फेंक दिया जाता है या दफना दिया जाता है और कारण बताया जाता है आर्थिक परेशानी.

बच्ची के हत्यारे अभिभावक यह दलील देते हैं कि उनके पास इतनी सामर्थ्य नहीं है कि वे बेटी का पालन-पोषण कर सकें. लेकिन सवाल यह उठता है कि जिस तरह से सीमित आमदनी में बेटों का लालन-पालन किया जा सकता है, क्या उसी सोच के साथ बेटी को जीने का हक नहीं दिया जा सकता?

Sunday, April 15, 2012

पहचान नहीं पहनावा



महिला को उसकी देह-यष्टि से तौलना उसकी बौद्धिक महिमा को मद्धिम समझने की हिमाकत करना है। लेकिन महिलाओं को परखने वाली मानसिकता उनके लिबास, स्टाइल, फिजिक से ही प्रभावित होती है। शीर्ष पदों पर बैठी दुनिया की तमाम महिलाओं की प्रतिभा को आंकने वालों की कट्टर मर्दवादी सोच किस कदर आड़े आ जाती है, इससे यह समझा जा सकता है
समय के साथ चलते हुए भी कुछ मानसिकताएं जल्दी नहीं बदलतीं। हम चाहे कितने भी आगे बढ़ जाएं अथवा आधुनिक होने का दावा करते रहें, हमारी मानसिकता वही की वही रहती है। क्या यह गजब नहीं है कि आज भी महिलाओं की शिक्षा, योग्यता, कार्यकुशलता, मेहनत, दक्षता और बुद्धिमत्ता को दरकिनार कर उनकी पहचान उनके वस्त्रों, लुक्स और फिगर के आधार पर की जाती है। अगर महिला की सूरत पुरुषों को भाने वाली हो तो उसके लिए सारी व्यवस्था कर दी जाती है, उसकी अक्लमंदी बाद में देखी जाती है। ऐसी धारणाएं आज भी बरकरार हैं। ऐसी कोई जगह नहीं है, जहां महिलाओं को उनकी योग्यता या कर्मठता की वजह से जाना जाता है। भले ही बाद में स्त्री अपनी बुद्धिमत्ता से दूसरों पर बीस या इक्कीस साबित हो, लेकिन उसके अच्छा होने की पहचान उसकी शक्ल-सूरत और कपड़े-लत्तों से ही बनती या बिगड़ती है। हमारे गणतंत्र दिवस समारोह में थाईलैंड की प्रधानमंत्री यिंग्लक शिनवात्रा भारत आई थीं। थाईलैंड ऐसा देश है, जिसे पूरी दुनिया सेक्स सेंटर के रूप में देखती है। शिनवात्रा उस मुल्क की पहली महिला प्रधानमंत्री हैं। ऐसी हस्ती का हमारे बीच होना वाकई गर्व की बात थी लेकिन उनके आने पर उनकी राजनीतिक उपलब्धियों से ज्यादा लोगों ने उनके लुक्स और पहनावे को अहमियत दी। वे क्या और कैसी हैं, इस पर वे कैसी दिखती हैं, यह भारी पड़ गया। उनकी फिगर और ड्रेस ही चर्चा का विषय रहे। उनसे मिलने वाले पुरुषों को खूबसूरत महिला से मिलने की खुशी ज्यादा थी, थाईलैंड की बागडोर संभालने वाली समय नह प्रधानमंत्री से मिलने का गौरव कम। ज्यादातर लोगों की रुचि उनकी स्टाइल और ड्रेस में थी, न कि इतना बड़ा पद और उसकी जिम्मेदारियां संभालने की उनकी कला में। यह बात समझ से परे है कि आखिर महिला की उपस्थिति बाकी तमाम बातों की गंभीरता को खत्म क्यों कर देती है? अगर बात फैशन की दुनिया की हो तो फिर भी समझ में आती है, क्योंकि फैशन की दुनिया सजने-संवरने, कपड़ों, लुक्स, स्टाइल और फिगर पर ही चलती है। लेकिन राजनीति में भी यही सब चीजें क्यों केंद्रीय हैं? राजनीति जैसे क्षेत्र में शख्सियत से ज्यादा उनके पहनावे और लुक्स की चर्चा महिलाओं की उपलब्धि को हल्का कर देती है। यह सोच पुरुषों की यौन-केंद्रित मानसिकता को उजागर करता है। इससे पहले पाकिस्तान की विदेश मंत्री हिना रब्बानी खार भारत आई थीं। तब अचानक हम पड़ोसी देश से अपनी कटुता भूल गये थे। मीडिया से लेकर हर किसी की जुबान पर हिना की खूबसूरती, फिगर और गेटअप हावी था। खार से संबंधित हर खबर की शुरु आत उनकी खूबसूरती के कसीदे पढ़ने के साथ होती थी। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया हो या प्रिंट मीडिया या फिर लोगों की जुबान, हर जगह पाकिस्तान की विदेश मंत्री की स्टाइल, लुक्स, फिगर पर ही सारा फोकस था। हिना रब्बानी खार की खूबसूरती की चमक-दमक में खोकर बाकी चीजों से लोगों का ध्यान हट गया। बेशक, इसके लिए मीडिया ही मुख्य रूप से जिम्मेदार था, लेकिन इसकी वजह क्या यह नहीं थी कि मीडिया पर परंपरागत तथा आधुनिकतावादी यौन-केंद्रित सोच की पुरुषवादी मानसिकता का कब्जा है? सुंदर या आकषर्क दिखने का प्रयास करना निंदनीय नहीं है। इसके लिए महिला और पुरुष, दोनों ही कोशिश करते हैं और खुद को आकषर्क बनाने की जद्दोजहद समान रूप से करते हैं। महिलाएं खुद को मेनटेन रखने के लिए जितनी कोशिश करती हैं, उतनी ही मशक्कत पुरुष भी अपनी बल्ले- सल्ले को बनाये रखने के लिए करता है। सजने-संवरने और दूसरों को आकर्षित करने की चाहत हर किसी की होती है। शुरू से थी और शायद आखिर तक रहेगी। आधुनिक समय में तो यह जरूरी भी माना जाता है लेकिन महिलाओं को सिर्फ उनकी सुदर्शना होने की कसौटी पर कसना उनके व्यक्तित्व के साथ गहरा अन्याय है। अब भी कंपनियां महिलाओं को ही रिसेप्शनिस्ट के लिए चुनती हैं, इसके लिए वह मानसिकता ही जिम्मेदार है, जिसके तहत माना जाता है कि महिलाएं शोपीस हैं या उन्हें देख कर फीलआएगा। नतीजा यह कि महिलाओं की योग्यता का एकमात्र पैमाना पुरुष की लालसा को संतुष्ट करने वाली फिजिकल अपीयरेंसकी कसौटी पर खरा उतरना हो गया है। पुरुषों द्वारा महिलाओं के लुक्स और पहनावे को उनके विचारों से ज्यादा तवज्जो दी जाती है। अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा और अमेरिका की फस्र्ट लेडी मिशेल जब भारत भ्रमण पर आए थे, उस समय मिशेल की आकृति और स्टाइल चर्चा का विषय बनी। उस पूरी यात्रा के दौरान मीडिया और सार्वजनिक चर्चा में मिशेल के पहनावे और स्टाइल की चर्चाबराक ओबामा की नीतियों से ज्यादा हुई। ओप्रा विन्फ्रे के मामले में भी यही मानसिकता हावी रही। विन्फ्रे के सफल वर्तमान के पीछे बड़ा भयानक और दर्दनाक अतीत है, जिससे लड़ कर उन्होंने अपना मुकाम हासिल किया और आज वे पूरी दुनिया में जानी जाती हैं। यही हाल उन अनेक महिलाओं का है, जिन्होंने नाम कमाया और पूरी दुनिया में अपनी पहचान बनाई। उनके वस्त्रों और लुक्स ने उन्हें वह पहचान नहीं दिलाई बल्कि नेतृत्व करने की क्षमता, योग्यता और कलात्मक ऊंचाई की बदौलत ही उन्होंने अपना मुकाम हासिल किया। स्त्री में गुण और योग्यता न हो, तो उसकी सुंदरता उसे कितनी ऊंचाई तक ले जा सकती है? गंभीर मसलों को गौण मान कर राजनीति में महिलाओं के फिजिकल अपीयरेंस और पहनावे की चर्चा, पुरुषवादी सोच को दर्शाता है। दरअसल, इस सोच के पीछे पुरुष का यह पूर्वाग्रह है कि महिलाएं गंभीर जिम्मेदारियों को उठाने के काबिल नहीं हैं। उनका किसी बड़े ओहदे पर पहुंचना और उसे संभालना महज संयोग है। इस सोच के जरिए पुरुष महिलाओं की योग्यता को नकारने की जुगत में लगा रहता है। इसलिए वह महिला को फैशन और ड्रेस के इर्द-गिर्द बांध कर देखता है और उसी के अनुसार उसका आकलन भी करता है। यह भोगवादी सामंती मानसिकता है। इससे मुक्त होने में पुरुषों को पता नहीं, कितनी सदियां लगेंगी! हैरान करने वाली बात तो यह है कि भारत समेत दुनिया के कई देशों में महिलाओं ने समय- समय पर सत्ता की कमान संभाली है और अपनी जिम्मेदारियों को बखू बी अंजाम देकर दूसरों के सामने बानगी भी प्रस्तुत की है। इसके बावजूद, उनके प्रभाव और क्षमता को पुरुष मन स्वीकार नहीं कर पाता। वह उन्हें सिर्फ स्त्री बना कर रखना चाहता है, जिसका काम पुरुषों का मनोरंजन करना है। इसीलिए पुरुष समाज महिलाओं को आगे नहीं बढ़ने देना चाहता।



अगर वह संघर्ष करके आगे बढ़ती भी हैं तो पुरुषों द्वारा मात्र उसके पहनावे और फिगर पर फोकस करना स्त्री को उसकी ही निगाह में हीन बनाने के औजार की तरह काम करता है। ऐसी स्थितियां अकसर महिलाओं को असहज कर देती हैं या उन्हें अतिरिक्त रूप से सतर्क कर देती हैं। पुरुष अपनी इस मानसिकता और रवैये का इस्तेमाल महिला की योग्यता को कम करके आंकने में करता है। लेकिन ऐसा करने वाले और ऐसी सोच रखने वाले पुरुष हमेशा यह भूल जाते हैं कि ये हरकतें उनकी ओछी मानसिकता का परिचायक भी बनती हैं। चकित करने वाली बात तो यह है कि महिलाओं को अधिकार और समानता देने की हिमायत करने वाले पुरुष भी अपनी इस विकृत सोच से उबर नहीं पाते। महिला को देह के रूप में देखे जाने की प्रवृत्ति शुरू से विद्यमान रही है। चाहे परंपरा हो या बाजार, दोनों जगह महिलाओं से जबरदस्ती जारी रहती है। परंपरा महिला को ज्यादा से ज्यादा ढंकना चाहती है तो बाजार उन्हें ज्यादा से ज्यादा उघाड़ना चाहता है। जो महिलाएं इन दोनों ही चंगुलों से बच निकलती हैं, उन्हें यौनवादी पुरुष मानसिकता धर- दबोचने की कवायद में जुट जाती है।
     

Friday, March 9, 2012


मत छीनो हमारा एकांत
पहले के मुकाबले महिलाओं की आत्मनिर्भरता बढ़ी है, वे जागरूक हुई हैं, और हर क्षेत्र में अपनी जिम्मदारियों को बखूबी निभा रही हैं। लेकिन अब भी उन्हें अपने ढंग से जीने का अधिकार नहीं मिल पाया है।  मनुष्य की सबसे बड़ी जरूरतों में है – एकांत, जहाँ वह सिर्फ अपने साथ रह सके। मनुष्य सामाजिक प्राणी है, पर वह एकांतप्रिय भी है। स्त्री और ज्यादा सामाजिक प्राणी है, इसलिए उसे अपने एकांत की  जरूरत और ज्यादा होती है। यह एकांत असामाजिक या समाज-विरोधी नहीं होता -  यह मनुष्य होने की अनिवार्य मांग है, जहाँ वह अपने जीवन में झांक सके, अपनी इच्छानुसार कल्पनाएं कर सके और अपना बार-बार पुनराविष्कार कर सके। लेकिन स्त्री को इससे ही वंचित रखने की कोशिश होती है। स्त्री के एकांत से पुरुष को इतना डर क्यों लगता है? क्योंकि एकांत ही वह जगह है जहां स्त्री सबसे ज्यादा स्वाधीन होती है। और, यह स्त्री की स्वाधीनता है जो पुरुष को सबसे ज्यादा अखरती है। यह उसे अपनी तानाशाही में हस्तक्षेप की तरह लगता है।  
एकांत किसे नहीं चाहिए? जो महिलाएं शादीशुदा हैं, अकेली हैं – अपने चुनाव से या तलाक के बाद अथवा किसी अन्य वजह से पति-परिवार के बिना अपने बच्चों को अकेले पाल रही हैं, सभी को समय-समय पर एकांत चाहिए। इनकी भी चाहत होती है कभी बोझिल पलों के बाद, कभी जाने-अनजाने आसपास से थोड़ा अलग हो कर, तो कभी पति-बच्चों-परिवार से कुछ क्षणों के लिए  दूर होकर, कभी व्यस्त दिनचर्या से थोड़ा समय अपने लिए निकालकर सुरक्षित एकांत की। प्रतिपल किसी न किसी की आंखों के दायरे में रहने की अपनी ऊब नहीं होती क्या? इसलिए हर स्त्री उस 'स्पेस' की कामना करती है, जिसमें वह नितांत अकेली रहकर अपने अस्तित्व का रसपान कर सके। कितना आनंदपूर्ण होता है बिना टोकाटाकी के टहलना, यूँ ही चहलकदमी करना या घंटों बैठकर आसमान की ओर ताकना। यह जगह  घर की बालकनी हो सकती है, पार्क का कोई कोना भी और सड़क का किनारा भी। यहाँ तक कि किसी भीड़-भरे मॉल की कोई सूनी बेंच भी, जो औरत को यह मौका देती है कि वह आने-जाने वालों को देख सके या अपने अकेलेपन में खोने का लुत्फ उठा सके।
जगह कोई भी हो सकती है, वह मन को सकून देने वाली होनी चाहिए। शर्त इतनी-सी है कि वह महिलाओं के लिए सुरक्षित हो। किसी के एकांत में खलल देना नैतिक अपराध है। स्त्री चाहती है कि उसके साथ यह अपराध न किया जाए। उसे कभी-कभी तो अपने साथ जीने के लिए मुक्त छोड़ दिया जाए – जहाँ वह न तो किसी की बेटी हो, न बहन, न पत्नी और न  माँ। स्त्री बस स्त्री हो – अपने अधूरेपन और अपने पूरेपन के साथ। लेकिन हमारा समाज इसके लिए तैयार नहीं हो पाता और हर अकेली महिला को संदिग्ध चरित्र का मान लिया जाता है। उसके अकेले बैठने, टहलने या आसमान को तकते रहने के आपत्तिजनक मायने निकाल लिए जाते हैं। स्त्री के अकेले होने को अस्वाभाविक समझा जाता है और इस पर सवाल खड़े किए जाते हैं। जहां ये सवाल मुखर नहीं होते, पुरुषों की आँखों से झाँकते हैं, उनके घूरने से प्रगट होते हैं, उनकी कनखियों से टपकते हैं और ज्यादा उग्र हुए तो हमले की शक्ल ले लेते हैं।  
इस शक्की बिरादरी में पुलिस भी शामिल है, जिसका एक काम सार्वजनिक स्थानों पर महिलाओं की  सुरक्षा सुनिश्चित करना है। अकेली औरत के साथ जिस पुलिस को दोस्ताना व्यवहार करना चाहिए, वह दुश्मन की तरह पेश आती है। स्त्री की मदद करने से पहले वह उससे यह पूछताछ करने से नहीं चूकती कि वह अकेले वहाँ बैठकर क्या कर रही थी? कोई बताए कि अकेले बैठना या अकेले टहलना किस दंड विधान के तहत जुर्म है?  मुसीबत तब और बढ़ जाती है जब वह महिला विपन्न या श्रमिक श्रेणी की प्रतीत होती हो। तब तो उस महिला के साथ कुछ अपमानजनक सम्भावनाएं  स्वतः जुड़ जाती हैं। रक्षक को भक्षक बनते देर नहीं लगती। गरिमामय पदों को सुशोभित करने वाले लोग भी यह कहने से नहीं चूकते कि भले घर की लड़कियों को रात में आना-जाना ही नहीं चाहिए या अकेले नहीं घूमना चाहिए। अगर अब भी महिलाओं के पैरों में जंजीरें डालकर रखनी हैं, उन्हें जीने का हक नहीं देना है, तो हम किस विकास की बात करते रहते हैं?
क्या यह हैरत की बात नहीं है कि जैसे-जैसे शिक्षा का फैलाव हो रहा है, मानव अधिकारों के कशीदे काढ़े जा रहे हैं, वैसे ही वैसे स्त्री को फिर से गुलाम बनाने की इच्छा बलवती होती जाती है? हम बेहतर समाज बनाने की कोशिश कर रहे हैं और महिलाओं को कैद करने की सोच रहे हैं। महिलाओं के लिए ड्रेस निर्धारित कर रहे हैं ताकि वे खुद को दमनकारी परम्परा के अनुकूल ढक कर रखें।  ‘लाडली’ और ‘बेटी बचाओ अभियान’ रचने वाला समाज औरतों को दिन ढलते ही घरों के भीतर कैद करने का पक्षधर है। जो  महिलाओं के सशक्तीकरण का पुरजोर समर्थन करते हैं, वे भी शाम ढलते ही महिला को घर की चारदीवारी के भीतर ही देखना और रखना चाहते हैं। वे किसी जरूरतवश घर से बाहर अकेली निकलने वाली महिलाओं की सुरक्षा की जिम्मेदारी नहीं लेते, बल्कि किसी महिला के साथ गलत हरकत होने पर उसे ही दोषी ठहराने से गुरेज नहीं करते। यहाँ तक कि बलात्कार जैसी जघन्य घटना के लिए भी महिला को ही दोषी मानते हैं।  जाहिर है, पुरुष समाज अपनी इस जड़ मानसिकता से मुक्त होने के लिए तैयार नहीं है कि अकेली औरत हमेशा संदिग्ध होती है। अकेलेपन को चरित्र के साथ जोड़कर एक नया और दमनमूलक सांस्कृतिक व्याकरण बनाया जा रहा है।
शहरी संस्कृति और उसके तहत विकसित हो रहा समाज, सार्वजनिक निर्माणों का ढांचा  - सभी तो लगातार महिला पर हर तरफ से नए दबाव बना रहे हैं। गरिमामय पदों को सुशोभित करने वाले लोग भी महिलाओं को यह हक देने के पक्ष में नहीं हैं कि गाहे-बगाहे ‘जब मन किया, जैसे मन किया, उस पल को जी लिया‘ । वे इसे सामाजिक मर्यादा के अनुकूल नहीं मानते। वे महिलाओं को यह प्राकृतिक अधिकार तक नहीं देना चाहते कि कहीं भी बैठ जाएँ, कहीं भी घूम लें, किसी से भी मिल लें। । वे मानते हैं, यह महिलाओं का मानवीय अधिकार नहीं, बल्कि समाज की कमजोरी है कि महिलाएँ 'उच्छृंखल' हो रही हैं। कहने की जरूरत नहीं कि इनकी भाषा में किसी भी तरह की स्वाधीनता उच्छृखलता का ही पर्याय है। क्या यह मजाक नहीं है कि स्त्री के आचरण के बारे में हमेशा पुरुष ही तय करेगा कि स्वाधीनता कहाँ खत्म होती है और उच्छृंखलता कहां से शुरू होती है। स्त्री के लिए पुरुष ही कानून बनाता है, वही मुकदमा भी चलाता है और वही फैसला भी सुनाता है।
जो स्त्री गुलामी की जंजीरें पहनने के लिए तैयार नहीं है,  अपने व्यक्तित्व पर पुरुष के कॉपीराइट को खारिज करती हैं और अपने जीवन को अपने ढंग से परिभाषित करना चाहती हैं, उसकी नैतिकता, उनका चारित्रिक प्रोफाइल और पारिवारिक पृष्ठभूमि, उनके मनोविज्ञान – यानी उसकी हर चीज पर   सवालिया निशान लगाए जा सकते हैं। सबसे बड़ी बात है कि अगर  उनके साथ कोई बदसलूकी हुई तो  अकसर उनके साथ खड़ा होने वाला कोई नहीं होता।  दरअसल, हमारा सामाजिक ताना-बाना ही ऐसा है कि हम महिलाओं के पृथक अस्तित्व की कल्पना नहीं कर पाते। समाज की नजर में  वह स्त्री हमेशा गलत होती है, जो पुरुषों द्वारा खींची गई रेखाओं को स्वीकार नहीं करती! चमकते हुए शहरों में, साफ-सुथरे मुहल्लों और  सभ्य कहे जाने वाले लोगों में महिलाओं के प्रति इतनी संकीर्णता क्यों है?
जरूरत है सोच में बदलाव की। अगर हम वाकई मानव स्वतंत्रता के पक्षधर हैं, आधुनिकता के उपासक हैं और मानव अधिकारों का सम्मान करते हैं, तो हमें अपने विचार बदलने होंगे। महिलाएं अब जागरूक हो रही हैं। वे थोपे हुए विचारों  व परम्पराओं को नहीं ढोना चाहतीं। वे अपने विवेक से काम लेना चाहती हैं। वे अपनी मनुस्मृति खुद रचना चाहती हैं। उन्हें अपना समाज चाहिए तो अपना एकांत भी चाहिए।  निवेदन है कि महिलाओं की चौहद्दी तय करने के बजाय उनकी सुरक्षा सुनिश्चित की जाए, उनकी गरिमा का खयाल रखा जाए ताकि वे अपनी आजादी का सही स्वाद ले सकें। स्त्रियों के सशक्तीकरण के लिए जो योजनाएं बनाई जाएं, उनका  प्रभाव  व्यवहार के धरातल पर भी दिखाई दे।  भयमुक्त समाज पुरुषों को ही नहीं, स्त्रियों को भी चाहिए। बल्कि महिलाओं को ज्यादा चाहिए, क्योंकि उनके आसपास के पुरुष ही उनकी जिंदगी में सबसे ज्यादा हस्तक्षेप करते हैं।  

परिवार का नया संपत्तिशास्त्र
सीत मिश्रा

योजना आयोग द्वारा गठित एक समिति ने महिला अधिकारों को लेकर एक क्रांतिकारी सिफारिश की है। महिला सशक्तीकरण पर काम कर रही इस समिति का सुझाव है कि विवाह के बाद अर्जित चल-अचल सम्पत्ति पर पति-पत्नी का मालिकाना हक बराबर हो। फिर यह संपत्ति पति-पत्नी में चाहे जिसने खरीदी हो। पारिवारिक जीवन से संबंधित कानून में बदलाव लाने की सिफारिश करते हुए, समिति ने  'राइट टू मैरिटल प्रॉपर्टी एक्ट' बनाने का सुझाव दिया है। इसके तहत तलाक की नौबत आने पर पति-पत्नी के बीच संपत्ति का बँटवारा बराबर-बराबर होगा। समिति की राय में, यह कानून सभी समुदायों पर लागू होना चाहिए।
वैवाहिक जीवन में आर्थिक बराबरी का विचार हर तरह से न्यायसंगत है। जब परिवार पति-पत्नी से बनता है, दोनों मिल कर घर को चलाते हैं, तो परिवार की आर्थिक स्थिति में भी दोनों का बराबर साझा होना चाहिए। इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि अधिकांश मामलों में पत्नी घर की देखभाल करती है और पति नौकरी या व्यापार करता है। मूल बात यह है कि परिवार एक भावनात्मक और कानूनी इकाई होने के साथ-साथ एक आर्थिक इकाई भी है। इस इकाई के भीतर समानता नहीं होगी, तो पति-पत्नी के रिश्तों में एक बुनियादी गैरबराबरी आ जाएगी, जिसके रहते वैवाहिक जीवन कभी भी सुखी नहीं हो सकता। परिवार के भीतर पति और पत्नी की अलग-अलग भूमिका को ज्यादा से ज्यादा श्रम विभाजन के रूप में ही स्वीकार किया जा सकता है। इस विभाजन में स्त्री की भूमिका या श्रम को हीन मान कर चलना स्त्री व्यक्तित्व का अवमूल्यन करना है। अगर हमें समाज में किसी तरह की तानाशाही मंजूर नहीं है, तो हमें परिवार को भी ज्यादा से ज्यादा लोकतांत्रिक बनाना होगा। हमें भूलना नहीं चाहिए कि आर्थिक बराबरी किसी भी समतामूलक व्यवस्था की पहली सीढ़ी है।
भारतीय समाज में शादी को जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। यह स्त्री और पुरुष, दोनों के लिए एक नई जिंदगी की शुरुआत होती है। विवाह के बाद वे जीवन भर के लिए एक आत्मीय बंधन में बंध जाते हैं। सात फेरों के साथ ही वे एक-दूसरे के जिंदगी भर के सुख-दुख के साथी बन जाते हैं। यानी हर चीज में बराबरी का दर्जा। लेकिन आय और संपत्ति में गैरबराबरी की स्थिति पत्नी को  परिवार के भीतर दोयम दर्जा प्रदान करती है। । । भारतीय संस्कारों के अनुसार, शादी के बाद पति का घर ही स्त्री का घर माना जाता है,  लेकिन अकसर यह सिर्फ कहने के लिए होता है। करनी से इसका  दूर-दूर तक कोई रिश्ता नहीं है।  पति जब तक मेहरबान है तब तक वह पत्नी का घर है ,लेकिन स्थिति विपरीत होने पर बड़ी आसानी से महिला को बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है – उसे बेघर कर दिया जाता है।  
इस असमान स्थिति के कारण विवाह स्त्री के लिए एक कैदखाना  बन जाता है। पति चाहे जैसा भी हो, शादी को बचाने की सारी जिम्मेदारी पत्नी  पर आ गिरती है।  आर्थिक स्वतंत्रता के अभाव में तलाक स्त्री के जीवन की सबसे बड़ी दुर्घटना है। इसलिए विवाह को बचाने के लिए वह सब कुछ सहने को लाचार है। इससे पुरुष की निरंकुशता को बढ़ावा मिलता है। इसे रोकने और स्त्री के व्यक्तित्व को खिलने देने का एक सहज तरीका यह है कि पति की आय और संपत्ति में पत्नी का बराबर का हिस्सा हो। इसी तर्क से पत्नी की संपत्ति में पति की स्वाभाविक साझेदारी हो जाती है। जाहिर है, समानता की यह व्यवस्था तभी कायम हो सकती है जब इसे कानून का दर्जा दे दिया जाए।
लेकिन इतना क्रांतिकारी कानून चुटकियों में नहीं बनाया जा सकेगा। हमारे समाज में कितने ऐसे पुरुष हैं जो अपनी संपत्ति में अपनी पत्नी को बराबर का हिस्सा देना चाहेंगे? हमारे सभी संस्कार विषमता पर आधारित हैं। इन संस्कारों के रहते हुए किन्हीं वजहों से दोनों के बीच तलाक होता है तो कितने पुरुषों का मन संपत्ति का आधा हिस्सा पत्नी को देने के लिए  तैयार होगा? जाहिर है, स्त्री-पुरुष संबंधों में इतना मूलभूत परिवर्तन ला पाना एक लंबा और कठिन संघर्ष है। अभी तो हम सिर्फ यह संतोष व्यक्त कर सकते हैं कि चलो, सही दिशा में विचार-विमर्श की शुरुआत तो हो ही गई है।
लेकिन यह कोई असंभव कार्य भी नहीं है। गोवा इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है, जहाँ पुर्चगीज शासन के दौरान बनाया गया यह कानून अभी भी जारी है कि विवाह के पहले और विवाह के बाद अर्जित सारी संपत्ति में पति-पत्नी का समान हिस्सा होगा। आजाद होने के बाद गोवा के कानून सिस्टम में बहुत-से परिवर्तन किए गए हैं, पर विवाह, परिवार आदि से संबंधित कानूनों को छेड़ा नहीं गया है। गोवा में पत्नी की इच्छा के विरुद्ध पति केवल आधी संपत्ति का ही जैसा चाहे उपयोग कर सकता है। वसीयत भी वह अपने हिस्से की संपत्ति का ही लिख सकता है। तलाक के बाद पति की आधी आमदनी पत्नी की हो जाती है। समानता की इसी कानूनी व्यवस्था के चलते गोवा में स्त्री की हैसियत पुरुष के बराबर है।  पत्नी-पत्नी के बीच जो समानता गोवा में संभव है, उसे देश के बाकी हिस्सों में संभव क्यों नहीं किया जा सकता?