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Friday, May 6, 2011

“कहने को जश्न-ए-बहारा है”

कहने के लिए भारत 21वीं सदी के विश्व की उभरती हुई वैश्विक महाशक्ति की संज्ञा दी गयी है। तकनीकी क्षेत्र में भी इसका कोई सानी नहीं है। इसके साथ ही दूसरे देश स्वयं को भारत से जोड़ने में अपना हित समझते हैं। दूसरे देशों की तरह भारत भी विकासशील से विकसित राष्ट्र में तब्दील होने की जुगत भिड़ा रहा है। हमारा भारत जो कभी जगत गुरु हुआ करता था अपने मूल्यों संस्कारों और संस्कृति के लिए जाना जाता था। जहां लोग संस्कृति और संस्कार को भारत की आत्मा कहते थे और उसी के दर्शन के लिए यहां आते थे।

अब वे मूल्य संस्कार कहीं नजर नहीं आते। शायद गाहे बगाहे उनका जिक्र किया जाता है। चन्द सालों पहले भारतीय समाज का मध्यम वर्गीय हिस्से के जुड़ने का माध्यम केवल आय नहीं था। सामान्य जन-जीवन में मूल्यों की अपनी मूल्य संहिता थी। भारतीय समाज का एक बड़ा तबका अपना सुख दुःख साझा करता था। सामाजिक रिश्तों में प्रगाढ़ता कुछ ऐसी थी कि लोग पड़ोस से चीनी-नमक तक मांग लाते थे और इसी आत्मीयता के चलते अवसर विशेष पर कुछ खास बनाकर एक दूसरे को भेट भी कर देते थे। हर वक्त एक दूसरे की मदद के लिए तत्पर रहते थे। उनके लिए रिश्ते बोझ नहीं बल्कि उनके जीवन जीने की यही शैली थी। उनका सामाजिक दायरा बहुत विस्तृत था। लेकिन बदलते समय की बदलती धारा के साथ अब भारत की वह छवि धुमिल होती जा रही है। परिस्थितियां ऐसी बदली की लगता है जैसे यह सब गुजरे जमाने की बातें हैं।

बीते 15 सालों में सामाजिक रिश्ते बहुत तेजी से परिवर्तित हुए हैं। रिश्तों को ताक पर रख दिया गया है। हम सामाजिक मूल्यों को खो रहे हैं। तकनीकि और उपभोक्तावादी होने को हम अपने विकास की कसौटी मान रहे हैं। मध्यम वर्ग को विस्थापित कर उपभोक्ता वर्ग ने उनका स्थान ले लिया है जहां लोगों को देश समाज और राजनीति से सरोकार नहीं है। उन्होंने अपने जीवन में भौतिकता को इतनी तरजीह दी है कि बाकी सारी बातें बेमानी हो गयी हैं। लोग भौतिकता और आडम्बर को अपनी उन्नति का पैमाना समझने लगे हैं। समाज भी इन्हीं कारणों से उन्हें सम्मानित नजरों से देखता है। अपनी अतृप्त लालसाओं की पूर्ति के लिए वे अधिकाधिक धनोपार्जन की कोशिश में दिन-रात लगे रहते हैं और इस नौकरी के अपने तनाव हैं, अपनी मजबूरियां हैं। उनके आस-पास उपस्थिति परिस्थितियां लोगों को ऐसे मकड़जाल में फंसा लेती हैं। कि लोग न चाहते हुए भी सामाजिक रिश्ते-नातों से कटने लगते हैं।
वर्तमान समय में एकल परिवार भी बिखरने के कगार पर है। उनका स्थान धीरे-धीरे नाभकीय परिवार लेने लगा है। इस भागमभाग जिन्दगी में सबसे ज्यादा मात रिश्ते खा रहे हैं। इस नये दौर में रिश्ते बेहतर से बद्तर की दिशा में अग्रसर हैं। जहां निजता का सम्मान नहीं, बल्कि निजता में दखल की उत्कंठा है। आधुनिकता में भौतिकता का घोल इस कदर शामिल है कि आर्थिक स्थितियों से ही व्यक्ति के कामयाबी का मापदण्ड होता हैं।
आर्थिक परिवेश का यह दायरा नितान्त संकुचित है जिसमें सम्बन्धों की गरिमा मू्ल्य मायने नहीं रखते। आधुनिकता की इस आंधी के दरम्यान रिश्तों ने अपना वजूद खो दिया है। रिश्तों की अहमियत पहले जैसी नहीं रह गयी है। अब मानसिक दायरा इतना संकीर्ण है कि इसमें सम्बन्धों का कोई औचित्य नहीं रह गया है। समय के साथ रिश्तों में विकृति आ गयी है। लोग अपनी हर छोटी-बड़ी खुशी को आर्थिक प्रगति के पीछे नजर अंदाज कर रहे हैं। अंधानुकरण के इस दौर में रिश्तों की मूल्य संहिता की धज्जियां उड़ चुकी हैं। कहीं कोई बेटा बाप की जायदाद के लिए जान ले रहा है तो कहीं पति कुल बीमा राशि के लिए पत्नी का गला रेत रहा है। बदलते समाज के बदलती विचारधारा में पैसों से ही व्यक्ति का चरित्र आकलन हो रहा है। ऐसे में यह प्रश्न उठना लाजमी हो जाता है कि लम्बे अन्तराल के बाद जब इन दरकते रिश्तों पर सिलन चलायी जायेगी तो क्या रिश्ते अपनी पूर्णता को प्राप्त कर पायेंगे? क्या आने वाले समय में हम अपनी भावी पीढ़ी को कुछ दे पायेंगे? खोखला समाज देकर हम उन्नतशील भारत की चाह रखते हैं! हम जो बोयेंगे वही काटना भी पड़ेगा । सब कुछ बिखर जाये इससे पहले हमारा जागना जरुरी है। जरुरत है रिश्तो को सहेजने और सम्भालने की वरना वक्त हमें कभी न भरने वाला कुछ जख्म दे जायेगा।
माना कि वर्तमान समय में भारत प्रगति की दिशा में आगे बढ़ रहा है, तरक्की कर रहा है। लेकिन अब तक इसी भारत के गौरवमयी इतिहास ने जीवन की निरंतरता और संस्कारों की तारतम्यता को बनाये रखने में सार्थक भूमिका निभाई है।हमारा इतिहास केवल घटनाओं का हिसाब किताब ही नहीं रखता, अपितु वह वर्तमान को सुधारने और आने वाले समय को सशक्त बनाने का माध्यम भी है।
अतः इनका अनुकरण करके हम अपने उत्थान की ओर उन्मुख हो सकते हैं। अगर हम अपने रिश्तों के साथ न्याय न कर सके तो भारत के विकसित होने का अर्थ बेमानी होकर रह जायेगा और शायद तब भारत महज आर्थिक महाशक्ति के रुप में एक सतही अवधारणा मात्र बनकर रह जायेगा।

Friday, September 3, 2010

वर्ष 1994 की मिस अर्जेंटिना सोलांगे मैग्नैनो ने अपने शरीर को और खूबसूरत बनाने की चाह में अपनी जान गंवा दी। मैग्नैनो अपनी शरीर की खूबसूरती बरकरार रखने के लिए कसरत और खान-पान तक ही नहीं रुकीं और खूबसूरती का यही जनून उनकी मौत का कारण बना। मैग्नैनो अपनी सफल मॉडलिंग एजेन्सी चलाती थी। कई बार प्लास्टिक सर्जरी द्वारा अपनी खूबसूरती में इजाफा करने वाली मैग्नैनो को 38 साल की उम्र में यह एहसास होने लगा था कि उनकी सुन्दरता कुछ धूमिल सी पड़ गई है, इसलिए अपने कूल्हे के आकार को ठीक कराने के लिए उन्होंने कॉस्मेटिक सर्जरी कराई लेकिन बदकिस्मती से कुछ यूं हुआ कि इस सर्जरी ने उनकी जान ले ली। मैग्नैनो के बारे में उनके एक मित्र का कहना है, “कि वह एक ऐसी स्त्री थी जो कामयाब थी, खूबसूरत थी, जिसके पास दुनिया का हर सुख था लेकिन अत्यधिक खूबसूरती की दीवानगी ने मैग्नैनो की जीवन लीला समाप्त कर दी”। मैग्नैनो की मौत आज बहस का विषय बन चुका है। इस मुद्दे पर बहस इसलिए भी है क्योंकि मैग्नैनो की मौत ने प्लास्टिक सर्जरी के बडेी उद्योग पर सवालिया निशान लगा दिया है। इस उद्योग के विस्तार का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि केवल अर्जेंटिना में ही हर तीसवीं महिला ने शरीर के किसी न किसी हिस्से की कास्मेटिक सर्जरी जरूर कराई है। आने वाले कुछ समय में यदि यह संख्या दसवीं तक पहुंच जाए तो यह कोई ताज्जुब की बात नहीं होनी चाहिए। अर्जेंटिना में इस सर्जरी का खर्चा दूसरे देशों के अपेक्षा कम है। यह व्यवसाय यहां खूब फल-फूल भी रहा है और इस व्यवसाय के जरिए पैसा भी खूब आ रहा है। आकड़ों की माने तो 2010 तक यानि आने वाले साल में अर्जेंटिना में यह उद्योग 100 बिलियन डॉलर तक पहुंच जाएगा। भारत में भी खूबसूरती की ये चाहत दिनों-दिन बढ़ रही है, चाहे बात छोटे पर्दे की हो अथवा बड़े पर्दे की। पर्दे पर दिखने वाली अभिनेत्रियों की छवियां आम युवतियों के हृदय में सपने पैदा करती हैं। सूचना के इस युग में महिलाएं इस बात से भली-भांति वाकिफ हैं कि बॉलीवुडिया नायिकाओं की खूबसूरती दैविक नहीं होती, इन्हें कृत्रिम तरीके से हासिल किया गया है मगर फिर भी आधुनिक समाज में महिलाएं सुंदरता के लिए कुछ भी कर गुजरने से गुरेज नहीं करती। सुन्दरता के सपने बेचने वाले उद्योगों और कम्पनियों ने महंगे कॉस्मेटिक्स प्लास्टिक सर्जरी और ब्यूटी पार्लर के जरिए महानगरीय महिलाओ में खूबसूरत बनने की होड़ मचा रखी है। काले को गोरा और बूढ़े को जवान बनाने का दावा करने वाली तमाम क्रीम बाजार में उपलब्ध है। दुनिया भर में सौन्दर्य प्रसाधनों का बाजार 20 अरब डालर से ज्यादा है। ‘फलां क्रीम 15 दिन में गोरा न बनाये तो पैसे वापस’, जाहिर है, दावे बहुत ऊंचे हैं इसीलिए मीडिया के जरिए सुन्दरता के ऐसे मानक तैयार किए जाते हैं जो आम महिलाओं के लिए शायद सम्भव न हों। महिलाओं की सुन्दरता का एक अंतर्राष्ट्रीय मानक बार्बी डॉल को ही लीजिए बार्बी गुड़िया के ढांचे के लिए शोधकर्ताओं ने उसके शरीर के अनुपात में कम्प्यूटर से एक महिला का माडल तैयार किया और खूबसूरती के इस मापदंड में महिला की कमर को इतना कमजोर रखा गया कि वह अपने उपरी हिस्से का बोझ नहीं उठा सकेगी। फिर भी बार्बी डॉल की शारीरिक बनावट को मीडिया ने आदर्श का रूप दे डाला। बावजूद इसके महिलाएं सौन्दर्य की मृगतृष्णा के पीछे निरन्तर भागती आईं हैं। इनमें भारतीय महिलाएं भी शामिल हैं। एक शोध के अनुसार हर चार में से तीन महिलाएं स्वयं की खूबसूरती को लेकर चिंतित रहती हैं। महिलाएं अपनी शारीरिक बनावट और खूबसूरती की तुलना फिल्मी हीरोइनों से करती हैं और उनके बनिस्बत खुद को कम खूबसूरत मानती हैं, यही कारण है कि वे सौन्दर्य उद्योगों का सहारा लेने के लिए विवश हो जाती हैं। महिलाओं के इसी असुरक्षा के भाव के चलते सौन्दर्य उद्योगों अपनी साख बनाए रखने में कामयाब है। सौन्दर्य प्रसाधन बनाने वाले और कॉस्मेटिक उद्योग को मंदी का यह दौर छू तक नहीं पाया है। भारत में भी ये उद्योग पूरी तरह अपना पांव पसार चुका है। कुछ वर्षों से वजन कम करने का दावा करने वाली कम्पनियां जमकर मुनाफा कमा रही है महिलाएं अपने स्वास्थ्य और आत्मसम्मान के साथ समझौते के रूप में जमकर मुनाफा कमा रही है। महिलाओं अपने आत्मसम्मान के साथ समझौते के रुप में खूबसूरती की कीमत अदा करनी पड़ती हैं महिलाओं की चिंता का विषय उनका बढ़ता वजन भी है वे छरहरी काया के पीछे पूरी सिद्दत से हर सम्भव कोशिश करती हैं। मिस अर्जेंटिना सोलांगे मैग्नैनो की मौत ने सुन्दरता उद्योग का निर्मम और भयावह चेहरा फिर से उजागर किया है। यह उन सभी महिलाओ के लिए चेतावनी स्वरुप है जो खूबसूरती की चाह में सौन्दर्य और कास्मेटिक सर्जरी उद्योग को अपने शरीर के साथ खिलवाड़ करने की इजाजत दे रही हैं। यह सिलसिला यूं ही जारी रहा तो भविष्य में सौंदर्य उद्योग जगत का और भी वीभत्स रूप हमारे सामने होगा।

Saturday, February 27, 2010

अहो भाग्य!

अहो भाग्य!
आंखों में आंसुओं का सैलाब है
सीने में मौजूद हैं बेहिसाब दर्द
कैसे करूं मैं अपने गम को बयां
लोग रोने भी नहीं देते
कहते हैं तुम्हारा भाग्य अच्छा था
जब अंतिम सांस ली तुम्हारे पिता ने
तो तुम उनके साथ थी
तुम उनके बहुत पास थी
मगर मन में
कुछ न कर पाने की कसक लिए हुए
अपने पिता को तड़पते हुए देखना
क्या मेरा अहो भाग्य था!

मेरे पिता को समर्पितः-

कैसे बचायें हम खुद को बिखर जाने से।
अब तो डर सा लगता है अपने आशियाने से
छोड़ गये हैं वो उदास हर मौसम को।
हम तो हंस देते थे कल तक जिनके मुस्कराने से।
न जाने कब तक पास रहेंगी ये तन्हाइंयाएक
जिन्दगी का साथ छुट जाने स
शायद महफिल कभी रोशन न हो सके वो हाथ नहीं रहे जो बचाते थे आफताब को बुझ जाने से
बहुत दूर चले गये हैं वो मेरी छुअन से
कैसे मनाऊं अब उन्हें रूठ जाने से।
कैसे बचाये हम खुद को बिखर जाने
से अब तो डर सा लगता है अपने आशियाने से

Tuesday, December 22, 2009

अनजाने शहर में

नोटः यह आलेख हिंदी भाषा के सबसे प्रतिष्ठित समाचार पत्र 'जनसत्ता' के नियमित कॉलम 'दुनिया मेरे आगे' में दिनांक 19 दिसंबर 2009 को प्रकाशित हो चुका है।
कुछ पाने की उम्मीद लिए मैं भी शामिल हो गयी दिल्ली के बाजार में। यहां आप जोड़-तोड़ करके कुछ पहचान तो पा लेते हैं लेकिन इस अंधी दौड़ में शामिल होकर अपना वजूद खो देते हैं। परिवार, लोगों दोस्तों, और पड़ोसियों ने बहुत समझाया पर जिद्द थी कि बस.. मुझे जाना है। कई लोगों ने मुझे अपने अनुभव सुनाए, मुझे सतर्क किया लेकिन हमेशा लगता रहा कि उनके अनुभव में सच्चाई नहीं है। मैं हरदम मानती रही कि ‘अच्छे के साथ हमेशा अच्छा ही होता है’ और इसी सिद्धांत को लेकर मैं चल पड़ी अंजाने सफर पर, अंजाने लोगों के बीच में। दिल्ली हर कदम पर आजमा रही थी कहीं डराती तो कहीं उम्मीदें जगा रही थी। दिल्ली की दौड़-धूप ने मुझे इस बात का एहसास करा दिया कि यहां सम्भावनाएं बहुत हैं पर सुकुन नहीं। इसी तर्ज पर चलती है दिल्ली। मेरी नजर में यही दिल्ली की वास्तविक पहचान है। मुझे मेरा लक्ष्य पता था पर उसके अभी भी सही रास्ते की तलाश जारी थी। दिल्ली की दौड़ती-भागती जिन्दगी बड़ी अजीब लगती है।
नौकरी की तलाश में इधऱ-उधर भटक रही थी। अधिकतर लोगों का बस यही जबाव होता ‘अभी जगह नहीं है’ कुछ लोग टाल-मटोल करके जता देते थे कि ‘आप चले जाइये यहां से हमारा समय बर्बाद मत कीजिए’। संयोग से मुझे भी दिल्ली में एक गॉड फॉदर मिल गये उन्होंने बड़े गौर से मेरी समस्या सुनी और उसे सुलझाने के लिए अपने दोस्त के ऑफिस मुझे भेज दिया। ऑफिस जाकर मैंने तमाम औपचारिकताएं निभाई घंटे भर के लम्बे इन्तजार के बाद श्रीमान जी ने मुझे अन्दर बुलाया सामने बैठने का इशारा करके वे अपनी फाइलों में व्यस्त हो गये। मैंने उनपर एक भरपूर नजर डाली। उनकी उम्र शायद 50 साल से उपर थी। आज क्या होगा के उधेड़बुन में पड़ी मैंने उनके चेहरे का पूरा निरीक्षण कर लिया था। थोड़ी देर बाद उन्होंने अपने काम से ध्यान हटाकर मुझसे पूछा, “तो तुम काम करने के लिए तैयार हो” मैंने सिर हिलाकर सहमति जताई इतनी ठोकरें खाने के बाद मेरे अन्दर निराशा घर कर गयी थी मैं हर बात को नकारात्मक ढ़ग से लेने लगी थी। ऐसे में एक ठौर मिल रहा था मैं उसे ठुकराना नहीं चाहती थी। मैंने अपने लिखे हुए व्यंग्य ,कविताओं और कहानियों की कतरनें उनकी ओर बढ़ा दीं। उन्होंने कहा, “इसकी कोई आवश्यकता नहीं है” मैं थोड़ी चकित हुई मैंने विस्मय से पूछा, “क्यों सर? यह सब देखकर आप इस बात का अंदाजा लगा सकते है कि मैं कैसा लिखती हूं और मैं आपकी संस्था के लिए किस प्रकार काम कर सकती हूं”। मेरी बातों को अनसुना करते हुए उन्होंने कहा, “ठीक है ठीक है यह सब छोड़ों बस मुझे खुश रखो यह तुम्हारा काम है” अपनी हरकतों से उन्होंने यह जता दिया कि उनके इरादे नेक नहीं हैं। उनकी बातों पर मुझे गुस्सा आ गया और जो मन में आया मैंने उन्हें भला-बुरा कहा। मेरे हलक से शब्द नहीं फुट रहे थे मैं पसीने से नहा उठी। उस शख्स शायद को इन बातों की आदत हो चुकी थी। उसने बड़े ही इत्मीनान से मेरी बात सुनी और कहा, यदि तुम्हें अपनी शील, मान-मर्यादा की इतनी ही चिन्ता थी तो तुम्हें अपने घर से निकलना ही नहीं चाहिए था। जिन्दगी भर चूहे के उसी बिल में पड़ी रहती, तुम्हें बाहर आने की जरुरत ही नहीं थी या फिर.......तुम्हारे लिए दुसरा रास्ता खुला है।’ उन्होंने बाहें फैलाते हुए कहा “जो तुम चाहती हो वो सारी खुशी तुम्हें यहां मिलेगी पर थोड़ी खुशी पर हमारा हक भी तो बनता है” इसके बाद उनके चेहरे पर कुटिल मुस्कान छा गई। मैं अन्दर ही अन्दर टूट रही थी। खुद के बिखर जाने के डर से मैने झट से अपनी सारी चीजें समेटीं और बाहर की ओर निकल पड़ी। एक अजीब सी बदहवासी और छटपटाहट थी मेरे भीतर । अजीब सी बेचैनी जो मेरे पूरे अस्तित्व को झकझोर रही थी। समूचा अस्तित्व जैसे बूंद-बूंद पिघलने लगा। परिवार, दोस्त, रिश्तेदार फिर सामने आकर खड़े हो गए। सारी बातें स्मृति पटल पर फिर से आ गईं। ‘अच्छे के साथ हमेशा अच्छा ही होता है’ सिध्दान्त जैसे धराशायी हो गया था। खुद को बुध्दिजीवी वर्ग के कहलाने वालों ने इस सिध्दान्त की धज्जियां उड़ा दी हैं। एक बड़ी पराजय की पीड़ा, अन्दर तक झकझोर देने वाली तिलमिलाहट और बुध्दिजीवियों के लिए अब बस एक कड़वाहट मात्र रह गयी थी। भले ही बहुत कुछ बदल गया हो पर आज भी लड़कियों के प्रति पुरुष समाज का नजरिया नहीं बदला है। इस सच का सामना मुझे दिल्ली में आकर हुआ। गावों, कस्बों से कामयाबी के सपने लिए आने वाली न जाने कितनी लड़कियों इस सच का सामना किया होगा।

Sunday, September 20, 2009

दबी जुबान से............

मैं एक जागरुक महिला पत्रकार हूं। निश्चय ही हमारा समाज पुरुषप्रधान रहा है और आज भी उसी रूप में कायम है। आप किसी भी पद पर हों उससे फर्क नहीं पड़ता, पर आप एक महिला है सिर्फ इस कारण आपको कई दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है। मैं ऐसे कई पुरूषों को जानती हूं, जो मिलने पर मुझसे दुआ-सलाम करना नहीं भूलते। चाहे यह मेरे लिए आदर को भाव हो अथवा समाज का डर। पर कुछ ऐसे भी हैं जिनकी निगाहें मुझे मेरे लड़की होने का अर्थ समझाती हैं। यह सच है कि हमारे देश में महिला प्रधानमंत्री रह चुकी है और महिला प्रशासन भी कायम रह चुका हैं। वर्तमान में महिला राष्ट्रपति और मुख्यमंत्री भी हैं, फिर भी महिलाएं शोषण का शिकार हैं। यह भी एक कड़वी सच्चाई है कि बजाय इसके कि हम उनकी मानसिक वेदना को कम कर करें, हम स्त्री शोषण के विषय में लिखकर उनके प्रति सिर्फ सहानुभूति ही व्यक्त करते हैं और यहीं पर अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर लेते हैं। प्राचीन काल में स्त्री को बराबरी का दर्जा हासिल था स्त्री को देवी का रुप मानते थे कहा भी गया है यत्र नार्यस्तु पुज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता।। शायद उस समय भी स्त्री के यौवनावस्था को ही सर्वाधिक महत्ता प्रदान की गयी थी यही कारण है कि पूरातन काल में राम और कृष्ण के बाल्यकाल का प्रसंग तो मिलता है परन्तु सीता और रुक्मणी का जीवन ही तब शुरू हुआ जब उन पर यौवन आया क्या कारण है कि यौवनावस्था से पहले या बाद में स्त्री के अस्तित्व का कोई जिक्र ही नहीं होता? उनके जीवन का ध्येय सिर्फ सौन्दर्यानुभूति कराना ही नहीं होता युवावस्था से पहले और बाद में भी उनका जीवन उतना ही सार्थक है जितना कि विशेष काल में।
एक साहित्यिक पत्रिका के संपादक ने भी इस बात को जब स्वीकारा कि पुरूष अपनी सुविधानुसार स्त्री को दो भागों में बांट दिया है कमर के उपर स्त्री माता है, देवी है, और कमर के नीचे सिर्फ भोग्या है इस तथ्य को सुनकर सम्पूर्ण पुरुष व्यवस्था तिलमिला उठी। वैसे हर सच को सुनने के पश्चात ऐसी ही तिलमिलाहट होती है, पर किसी पुरुष के मुख से यह तथ्य सुनकर सन्तोषजनक अनुभूति हुई क्योंकि अब तक तो स्त्रियों को वस्तु मात्र के रुप में पुरुषों द्वारा ही तव्वजो दी गयी है।
स्त्री को इज्जत, मान-मर्यादा से जोड़कर देखे जाने में भी साजिश कि बू आती है। स्त्रीयों को दबाव में रखने के लिए, उन पर अंकुश बनाये रखने के लिए ही ये सारे प्रंपच रचे गये है। मै महिला आरक्षण बिल के खिलाफ शुरु से रही हूं इसका कोई फायदा महिलाओं को तो मिल नहीं पाता है। एक शब्द प्रचलित हुआ है प्रधानपति जिसमें महिलाओं को सभी कर्तव्यों और अधिकारों से वंचित रखा जाता हैं। यह है उस आरक्षण की सच्चाई वहां पुरुष अपना आधिपत्य जमाये रखता है स्त्री का नाम मात्र होता है।
हम महिलाओं को दया की जरुरत कतई नहीं है। सीता, सावित्री को तो कभी आरक्षण की जरुरत नही पड़ी ऐसा नहीं था कि उन्होंने कोई संघर्ष नहीं किया उन्होंने बिना किसी सहारे के अपने बलबूते पर स्वयं को त्याग तपस्या की देवी के रुप में स्थापित किया इसी को पुरुषों ने स्त्री का मानक मान लिया जबकि यथार्थ बस इतना है कि महिलाएं अपने आप को किसी भी परिस्थति में ढ़ाल सकती है यदि उसमें बलिदान देने की क्षमता है तो जरुरत पड़ने पर बलिदान ले भी सकती है ऐसी होती है स्त्रीयां। हर तरफ से स्त्रीयों को छला जाता है कभी सुरक्षा के नाम पर तो कभी मर्यादा के नाम पर। लेकिन सबसे बड़ी बिडंवना भी यही है कि स्त्री पुरुषों द्वारा ही ठगी जाती है और पुरुष का ही सहारा लेती है।
शायद इसलिए क्योंकि स्त्री पुरुष एक-दूसरे के पूरक होते है और एक-दूजे के बिना उनका कोइ अस्तित्व ही नहीं है। स्त्री पुरुष का एक-दुसरे का विरोधी होना प्रकृति के नियमों के खिलाफ है पर यह बात पुरुषों को भी समझनी होगी कि बिना स्त्री के उनकी कोइ पहचान नहीं है और ना ही अस्तित्व। ईश्वर ने मां बनने का गौरव सिर्फ स्त्रीयों को ही दिया है तो इसका कारण सिर्फ पुरुषों को बनाया है।
सृष्टि रचते समय जब ईश्वर ने स्त्री और पुरुष में कोइ भेदभाव नहीं किया तो हम और आप कौन होते हैं? ईश्वर की व्यवस्था के साथ खिलवाड़ करने वाले। यह सच है कि स्त्रीयों का शोषण पुरुषों द्वारा किया जाता है किन्तु इसका एक बड़ा कारण यह भी है कि स्त्री ने अपने उपर होने वाले हर ज्यादतीय को सहर्ष स्वीकार किया है जैसा कि अरस्तू ने कहा है कि “यदि आप स्वंय को गधा घोषित कर देंगे तो सारी दुनिया अपना बोझ आपके उपर रख देगी”। इसलिए जरूरत है तो बस महिलाओं के जागृत होने की और उन सारे बोझों को उतार फेंकने की जो उसे झुका रहे है। उन्हें स्वयं सामने आना होगा स्वयं लड़ना होगा अपनी ज़रूरतों के लिए, और अपने खिलाफ हो रहे अन्याय के लिए।

Thursday, August 13, 2009

बदसूरती के फायदे

आजकल रिसर्च करने का मौसम अपने चरम पर है। एक दिन मुझे भी सनक सवार हुई कि मैं भी रिसर्च करूं कि लोग किस तरह की पत्नी को प्राथमिकता देते है, कैसी पत्नी चाहते है। जमाना बदला है, लोग बदले है और समय के अनुसार लोगों की सोंच भी बदली है। यह सवाल जितना टेढ़ा है उससे ज्यादा टेढ़ा इसका जबाव है। इस शुभ कार्य को करने से पहले मैंने यह जरूरी समझा कि दूसरों के घर में झांकने से पहले मैं अपने घर में देख लूं। इसलिए मैंने इस पुनीत कार्य का सुभारम्भ अपने ही घर से किया। मेरे भाई साहब सभी मामलों में अपने उत्तम विचार जरुर व्यक्त करते हैं। मैंने एक इंटरव्यूवर की तरह अपना यक्ष प्रश्न उनके समक्ष रख दिया। भाई साहब ने मुझे एक टीचर की भांति भली प्रकार सुना फिर उसने अपने एक पैर पर दूसरा पैर रखते हुए अपने गले को साफ किया और अपने ख्वाबों की बीबी की कलाकृति विचारों के जरिए मेरे समक्ष रेखांकित करनी शुरू की। " मेरी बीबी वही हो सकती है जिसका रंग पूर्णतया श्याम हो ताकि उसके बालों और चेहरे में कोई फर्क न किया जा सके यानि उसके पास गोरी चमड़ी न हो पर वह भरपूर दमड़ी जरूर होनी चाहिए। उसका वजन एक स्वस्थ भैंस के आस-पास होना चाहिए। उसकी हंसी ऐसी भयंकर होनी चाहिए कि एक बार मिलने के पश्चात दुबारा मिलने की तमन्ना ना हो ।" मुझे तनिक भी यह अंदाजा नहीं था कि समय बदलने के साथ लोगों की सोंच में इतना बड़ा परिवर्तन आ गया है। भाई का यह वैचारिक तीर मेरे लिए असहनीय था। दुनिया की किसी भी लड़की को ये विचार पसंद नहीं आ सकते। हम लड़कियां जो ब्यूटी पार्लर में अपना सारा पैसा बहा देती हैं उसकी ऐसी बेकद्री हम कतई बर्दाश्त नहीं कर सकते। इस दौरान मैंने दूसरा प्रश्न दागा कि भला इस समय जबकि हर कोई गोरी चमड़ी के पीछे भाग रहा है तो आपके विचार इतने अलग क्यों हैं ? भाई साहब मुझे देखकर शातिर नेता की तरह मुस्कराए और मुझे नासमझ बच्चे की तरह समझाते हुए लड़की के खूबसूरत न होने के फायदे गिनाना शुरु किया। "तुम तो जानती ही हो कि आजकल जमाना कितना खराब है। हर जगह छोटी-छोटी बातों पर दंगे फसाद हो रहे है। पत्नी के बदसूरत होने से पहला फायदा यह होगा कि न तो लोग उस पर फिदा होगें और न ही फब्तियां कसेंगे और इससे मुझे किसी से मारपीट भी नहीं करनी पड़ेगी। दूसरा फायदा यह होगा कि वह मेरे अफेयरों पर भी शक नहीं करेगी क्योंकि उसे हमेशा यह विश्वास रहेगा कि अगर मेरी लाइफ में कोई और होता तो मैं उसे पसंद ही क्यों करता ? इसके अलावा अन्य लड़कियां मेरे साथ रह सकेंगी और शादी के लिए दबाब भी नहीं बनायेंगी।" बीवी की बदसूरती के फायदे सुनकर मेरा मुंह खुला का खुला रह गया। मेरे पास अब इतनी हिम्मत नहीं बची थी कि मैं अपने इस शोध कार्य को आगे बढ़ा पाती। मैं धीरे से उठी और अपने थके कदमों से धीरे-धीरे बाहर चली आई।